भारत का इतिहास

बुधवार, नवंबर 18, 2015

कुचिपुड़ि नृत्य

कुचिपुड़ि नृत्य  

(कुची पुडी नृत्य से पुनर्निर्देशित)
कुची पुडी नृत्य, आंध्र प्रदेश
कुचिपुड़ि आंध्र प्रदेश की एक स्‍वदेशी नृत्‍य शैली है जिसने इसी नाम के गांव में जन्‍म लिया और पनपी, इसका मूल नाम कुचेलापुरी या कुचेलापुरम था, जो कृष्‍णा ज़िले का एक कस्‍बा है। अपने मूल से ही यह तीसरी शता‍ब्‍दी बीसी में अपने धुंधले अवशेष छोड़ आई है, यह इस क्षेत्र की एक निरंतर और जीवित नृत्‍य परम्‍परा है। कुचीपुडी कला का जन्‍म अधिकांश भारतीय शास्‍त्रीय नृत्‍यों के समान धर्मों के साथ जुड़ा हुआ है। एक लम्‍बे समय से यह कला केवल मंदिरों में और वह भी आंध्र प्रदेश के कुछ मंदिरों में वार्षिक उत्‍सव के अवसर पर प्रदर्शित की जाती थी।

इतिहास

परम्‍परा के अनुसार कुचीपुडी नृत्‍य मूलत: केवल पुरुषों द्वारा किया जाता था और वह भी केवल ब्राह्मण समुदाय के पुरुषों द्वारा। ये ब्राह्मण परिवार कुचीपुडी के भागवतथालू कहलाते थे। कुचीपुडी के भागवतथालू ब्राह्मणों का पहला समूह 1502 ए. डी. निर्मित किया गया था। उनके कार्यक्रम देवताओं को समर्पित किए जाते थे तथा उन्‍होंने अपने समूहों में महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया।

पुन: परिभाषित

कुचिपुड़ि नृत्यांगना
महिला नृत्‍यांगनाओं के शोषण के कारण नृत्य कलाके ह्रास के युग में एक सिद्ध पुरुष सिद्धेंद्र योगी ने नृत्‍य को पुन: परिभाषित किया। कुचीपुडी के पंद्रह ब्राह्मण परिवारों ने पांच शताब्दियों से अधिक समय तक परम्‍परा को आगे बढ़ाया है। प्रतिष्ठित गुरु जैसे वेदांतम लक्ष्‍मी नारायण, चिंता कृष्‍णा मूर्ति और ता‍देपल्‍ली पेराया ने महिलाओं को इसमें शामिल कर नृत्‍य को और समृद्ध बनाया है। डॉ. वेमापति चिन्‍ना सत्‍यम ने इसमें कई नृत्‍य नाटिकाओं को जोड़ा और कई एकल प्रदर्शनों की नृत्‍य संरचना तैयार की और इस प्रकार नृत्‍य रूप के क्षितिज को व्‍यापक बनाया। यह परम्‍परा तब से महान बनी हुई है जब पुरुष ही महिलाओं का अभिनय करते थे और अब महिलाएं पुरुषों का अभिनय करने लगी हैं।

नृत्‍य नाटिका

कुची पुडी नृत्य
कुचीपुडी कला एक ऐसे नृत्‍य नाटिका के रूप में आशयित की गई थी, जिसके लिए चरित्र का एक सैट आवश्‍यक था, जो केवल एक नर्तक द्वारा किया जाने वाला नृत्‍य नहीं था जो आज के समय में प्रचलित है। इस नृत्‍य नाटिका को कभी कभी अट्टा भागवतम कहते हैं। इसके नाटक तेलुगु भाषा में लिखे जाते हैं और पारम्‍परिक रूप से सभी भूमिकाएं केवल पुरुषों द्वारा निभाई जाती है।

प्रस्‍तुतिकरण

कुचीपुडी नाटक खुले और अभिनय के लिए तैयार मंचों पर खेले जाते हैं। इसके प्रस्‍तुतिकरण कुछ पारम्‍परिक रीति के साथ शुरू होते हैं और फिर दर्शकों को पूरा दृश्य प्रदर्शित किया जाता है। तब सूत्रधार मंच पर सहयोगी संगीतकारों के साथ आता है और ड्रम तथा घंटियों की ताल पर नाटक की शुरुआत करता है। एक कुचीपुडी प्रदर्शन में प्रत्‍येक प्रधान चरित्र दारु के साथ आकर स्‍वयं अपना परिचय देता है। दारु नृत्‍य की एक छोटी रचना है और प्रत्‍येक चरित्र को अपनी पहचान प्रकट करने के लिए एक विशेष गीत दिया जाता है साथ ही वह‍ नृत्‍यकार को कला का कौशल दर्शाने में भी सहायता देता है। एक नृत्‍य नाटिका में लगभग 80 दारु या नृत्‍य क्रम होते हैं। एक सुंदर पर्दे के पीछे, जिसे दो व्‍यक्ति पकड़ते हैं, सत्‍यभामा दर्शकों की ओर पीठ किए हुए मंच पर आती हैं। भामा कल्‍पम में सत्‍यभामा विप्रलांबा नायिकी या नायिका हैं जिसे उसका प्रेमी छोड़ गया है और वह उसकी अनुपस्थिति में उदास है।

मटका नृत्‍य

कुचीपुडी नृत्‍य का सबसे अधिक लोकप्रिय रूप मटका नृत्‍य है जिसमें एक नर्तकी मटके में पानी भर कर और उसे अपने सिर पर रखकर पीतल की थाली में पैर जमा कर नृत्‍य करती है। वह पीतल की थाली पर नियंत्रण रखते हुए पूरे मंच पर नृत्‍य करती है और इस पूरे संचलन के दौरान श्रोताओं को चकित कर देने के लिए उसके मटके से पानी की एक बूंद भी नहीं गिरती है।

गोला कलापम

कुचिपुड़ि नृत्य, आंध्र प्रदेश
भामा कल्‍पम के अलावा एक अन्‍य प्रसिद्ध नृत्‍य नाटिका है गोला कलापम जिसे भगवत रामाया ने लिखा है, तिरुमाला नारयण चिरयालु द्वारा लिखित प्रहलाद चरितम, शशि रेखा परिणय आदि।

विशेषता

इस कला की साज सज्‍जा और वेशभूषा इसकी विशेषता हैं। इसकी वेशभूषा और साज सज्‍जा में बहुत अधिक कुछ नहीं होता है। इसकी एक महत्‍वपूर्ण विशेषता इसके अलग अलग प्रकार की सज्‍जा में है और इसके महिला चरित्र कई आभूषण पहनते हैं जैसे कि रकुडी, चंद्र वानिकी, अडाभासा और कसिनासारा तथा फूलों और आभूषणों से सज्जित लंबी वेणी।

संगीत वाद्य

कुचीपुड़ी का संगीत शास्‍त्रीय कर्नाटक संगीत होता है। मृदंगवायलिन और एक क्‍लेरीनेट इसमें बजाए जाने वाले सामान्‍य संगीत वाद्य हैं।

वर्तमान समय

आज के समय में कुचिपुड़ि में भी भरतनाट्यम के समान अनेक परिवर्तन हो गए हैं। वर्तमान समय के नर्तक और नृत्‍यांगनाएं कुचीपुडी शैली में उन्‍नत प्रशिक्षण लेते हैं और अपनी वैयक्तिक शैली में इस कला का प्रदर्शन करते हैं। इसमें वर्तमान समय में केवल दो मेलम या पुरुष प्रदर्शकों के व्‍यावसायिक दल हैं। इसमें अधिकांश नृत्‍य महिलाएं करती हैं। वर्तमान समय के प्रदर्शन में कुचीपुडी नृत्‍य नाटिका से घट कर नृत्‍य तक रह गया है, यह जटिल रंग मंच अभ्‍यास के स्‍थान पर नियमित मंच प्रदर्शन बन गया है।

मोहिनीअट्टम

मोहिनीअट्टम  

मोहिनीअट्टम
मोहिनीअट्टम
विवरणमोहिनीअट्टम केरल की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला अर्ध शास्त्रीय नृत्य है जो कथकली से अधिक पुराना माना जाता है।
इतिहासमोहिनीअटट्म का प्रथम संदर्भ माजामंगलम नारायण नब्‍बूदिरी द्वारा संकल्पित व्‍यवहार माला में पाया जाता है जो 16वीं शताब्‍दी में रचा गया।
नृत्‍य तालतगानम, जगानम, धगानम, सामीश्रम
मोहिनी का अर्थएक ऐसी महिला जो देखने वालों का मन मोह ले।
धार्मिक मान्यतायह भगवान विष्णु की एक जानी मानी कहानी है कि जब उन्‍होंने दुग्‍ध सागर के मंथन के दौरान लोगों को आकर्षित करने के लिए मोहिनी का रूप धारण किया था और भस्मासुर के विनाश की कहानी इसके साथ जुड़ी हुई है।
वेशभूषानृत्‍यांगना को केरल की सफ़ेद और सुनहरी किनारी वाली सुंदर कासावू साड़ी में सजाया जाता है।
अन्य जानकारीयह अनिवार्यत: एकल नृत्‍य है किन्‍तु वर्तमान समय में इसे समूहों में भी किया जाता है।
मोहिनीअट्टम (अंग्रेज़ी:Mohiniyattamकेरल की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला अर्ध शास्त्रीय नृत्य है जो कथकली से अधिक पुराना माना जाता है। साहित्यिक रूप से नृत्‍य के बीच मुख्‍य माना जाने वाला जादुई मोहिनीअटट्म केरल के मंदिरों में प्रमुखत: किया जाता था। यह देवदासी नृत्‍य विरासत का उत्तराधिकारी भी माना जाता है जैसे किभरतनाट्यमकुची पुडी और ओडिसी। इस शब्‍द मोहिनी का अर्थ है एक ऐसी महिला जो देखने वालों का मन मोह ले या उनमें इच्‍छा उत्‍पन्‍न करें। यह भगवान विष्णु की एक जानी मानी कहानी है कि जब उन्‍होंने दुग्‍ध सागर के मंथन के दौरान लोगों को आकर्षित करने के लिए मोहिनी का रूप धारण किया था और भस्मासुर के विनाश की कहानी इसके साथ जुड़ी हुई है। अत: यह सोचा गया है कि वैष्‍णव भक्तों ने इस नृत्‍य रूप को मोहिनीअटट्म का नाम दिया।

इतिहास

मोहिनीअटट्म का प्रथम संदर्भ माजामंगलम नारायण नब्‍बूदिरी द्वारा संकल्पित व्‍यवहार माला में पाया जाता है जो 16वीं शताब्‍दी में रचा गया। 19वीं शताब्‍दी में स्‍वाति तिरुनाल, पूर्व त्रावण कोर के राजा थे, जिन्‍होंने इस कला रूप को प्रोत्‍साहन और स्थिरीकरण देने के लिए काफ़ी प्रयास किए। स्‍वाति के पश्‍चात के समय में यद्यपि इस कला रूप में गिरावट आई। 
मोहिनीअट्टम नृत्य, केरल
किसी प्रकार यह कुछ प्रांतीय जमींदारों और उच्‍च वर्गीय लोगों के भोगवादी जीवन की संतुष्टि के लिए कामवासना तक गिर गया। कवि वालाठोल ने इसे एक बार फिर नया जीवन दिया और इसे केरल कला मंडलम के माध्‍यम से एक आधुनिक स्‍थान प्रदान किया, जिसकी स्‍थापना उन्‍होंने 1903 में की थी। कलामंडलम कल्‍याणीमा, कलामंडलम की प्रथम नृत्‍य शिक्षिका थीं जो इस प्राचीन कला रूप को एक नया जीवन देने में सफल रहीं। उनके साथ कृष्‍णा पणीकर, माधवी अम्‍मा और चिन्‍नम्‍मू अम्‍मा ने इस लुप्‍त होती परम्‍परा की अंतिम कडियां जोड़ी जो कलामंडल के अनुशासन में पोषित अन्‍य आकांक्षी थीं।

भगवान के प्रति समर्पण

मोहिनीअटट्म की विषय वस्‍तु प्रेम तथा भगवान के प्रति समर्पण है। विष्णु या कृष्ण इसमें अधिकांशत: नायक होते हैं। इसके दर्शक उनकी अदृश्‍य उपस्थिति को देख सकते हैं जब नायिका या महिला अपने सपनों और आकांक्षाओं का विवरण गोलाकार गतियों, कोमल पद तालों और गहरी अभिव्‍यक्ति के माध्‍यम से देती है। नृत्‍यांगना धीमी और मध्‍यम गति में अभिनय के लिए पर्याप्‍त स्‍थान बनाने में सक्षम होती है और भाव प्रकट कर पाती है। इस रूप में यह नृत्‍य भरतनाट्यम के समान लगता है। इसकी गतिविधियोंओडिसी के समान भव्‍य और इसके परिधान सादे तथा आकर्षक होते हैं। यह अनिवार्यत: एकल नृत्‍य है किन्‍तु वर्तमान समय में इसे समूहों में भी किया जाता है। मोहिनीअटट्म की परम्‍परा भरत नाट्यम के काफ़ी क़्ररीब चलती है। चोल केतु के साथ आरंभ करते हुए नृत्‍यांगना जाठीवरम, वरनम, पदम और तिलाना क्रम से करती है। वरनम में शुद्ध और अभिव्‍यक्ति वाला नृत्‍य किया जाता है, जबकि पदम में नृत्‍यांगना की अभिनय कला की प्रतिभा‍ दिखाई देती है जबकि तिलाना में उसकी तकनीकी कलाकारी का प्रदर्शन होता है।

नृत्‍य ताल

मोहिनीअट्टम नृत्य
मूलभूत नृत्‍य ताल चार प्रकार के होते हैं:
  • तगानम
  • जगानम
  • धगानम
  • सामीश्रम
ये नाम वैट्टारी नामक वर्गीकरण से उत्‍पन्‍न हुए हैं।

वेशभूषा

मोहिनीअटट्म में सहज लगने वाली साज सज्‍जा और सरल वेशभूषा धारण की जाती है। नृत्‍यांगना को केरल की सफ़ेद और सुनहरी किनारी वाली सुंदर कासावू साड़ी में सजाया जाता है।

हस्‍त लक्षण दीपिका

अन्‍य नृत्‍य रूपों के समान मोहिनीअटट्म में हस्‍त लक्षण दीपिका को अपनाया जाता है, जैसा कि मुद्रा की पाठ्य पुस्‍तक या हाथ के हाव भाव में दिया गया है। मोहिनीअटट्म के लिए मौखिक संगीत की शैली, जैसा कि आमतौर पर देखा गया है, शास्‍त्रीय कर्नाटक है। इसके गीत महाराजा स्‍वाति तिरुनल और इराइमान थम्‍पी द्वारा किए गए हैं जो मणिप्रवाल (संस्‍कृत और मलयालम का मिश्रण) में हैं। हाल ही में थोपी मडालम और वीना ने मोहिनीअटट्म में पृष्‍ठभूमि संगीत प्रदान किया। उनके स्‍थान पर हाल के वर्षों मेंमृदंग और वायलिन आ गया है।

कथकली नृत्य

कथकली नृत्य  

कथकली नृत्य, केरल
कथकली नृत्य केरल के दक्षिण-पश्चिमी राज्‍य का एक समृद्ध और फलने-फूलने वाला शास्त्रीय नृत्य तथा यहाँ की परम्‍परा है। 'कथकली' का अर्थ है- 'एक कथा का नाटक' या 'एक नृत्‍य नाटिका'। 'कथा' का अर्थ है- 'कहानी'। इस नृत्य में अभिनेतारामायण और महाभारत के महाग्रंथों और पुराणों से लिए गए चरित्रों का अभिनय करते हैं। यह अत्‍यंत रंग-बिरंगा नृत्‍य है। इसके नर्तक उभरे हुए परिधानों, फूलदार दुपट्टों, आभूषणों और मुकुट से सजे होते हैं। वे उन विभिन्‍न भूमिकाओं को चित्रित करने के लिए सांकेतिक रूप से विशिष्‍ट प्रकार का रूप धरते हैं, जो वैयक्तिक चरित्र के बजाए उस चरित्र के अधिक नज़दीक होते हैं।

कथा नृत्य

भारतीय नृत्य रूपों में अद्वितीय कथकली नृत्य केरल का शास्त्रीय नृत्य नाटक है। ज्वलंत और समृद्व विशेषताओं जैसे हाथों के साथ गाना, भाव में प्राकृतिक और प्रभावशाली, हलचल में सुंदर और तालबद्व, नृत्य में मनमोहक और सबसे ख़ास कल्पना के स्तर पर मनभावन के कारण भारतीय नृत्य कलाओं में कथकली को उच्च दर्जा प्राप्त है। विषयों के आधार पर कथकली प्राचीन पुराणों की कथाओं पर आधारित है। अगर इसकी पुरातन वेशभूषा, अजीबो-गरीब रूप सज्जा ओर भव्यआभूषणों को देखें तो हम पायेंगे कि कथकली भारत का एकमात्र ऐसा नृत्य है, जो अपनी मर्दाना पहलू की मौलिक ताकत पर संरक्षित है।[1]

इतिहास

कथकली के बारे मे यह माना जाता है कि यह 300 या 400 साल पुरानी कला नहीं हैं, इसकी वास्तविक उत्पत्ति 1500 साल पहले से है। कथकली विकास की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरी है और इसकी इस यात्रा ने केरल में कई अन्य मिश्रित कलाओं के जन्म और विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया है। कथकली को आर्यन और द्रविड सभ्यता के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसने अनुष्ठान और संस्कृतियों को समझते हुए उनके साथ मिलकर इन सभ्यताओं से नाटक और नृत्य की इस कला को उधार लिया। कथकली के इतिहास के पुनर्निर्माण में यह बात ध्यान रखना आवश्यक है कि व्यवहारिक रूप से सभी प्रकार के औपचारिक नृत्य, नाटक और नृत्य नाटक की सभी कलाओं को अस्तित्व में लाने का श्रेय कथकली को ही जाता है। एक अध्ययन के दौरान यह साबित भी हो चुका है कि केरल के सभी प्रारंभिक नृत्य और नाटक जैसे- 'चकइरकोथू' और 'कोडियाट्टम', कई धार्मिक नृत्य जो भगवती पंथ से संबंधित है जैसे- 'मुडियाअट्टू', 'थियाट्टम' और 'थेयाम', सामाजिक, धार्मिक और वैवाहित नृत्य जैसे- 'सस्त्राकली' और 'इजामट्क्कली' और बाद में विकसित नृत्य जैसे- 'कृष्णाअट्टम' और 'रामाअट्टम' आदि कथकली की ही देन हैं। कथकली कला में कई नृत्य और नाटकों की विशेषताओं को शामिल किया जा सकता है और यह वर्णन करने में भी आसान है कि कथकली इन रूपों के प्रारंभ में ही विकसित हो चुकी थी।
कथकली नृत्य, केरल

मूकाभिनय सम्पूर्ण कला

कथकली अभिनय, 'नृत्य' (नाच) और 'गीता' (संगीत) तीन कलाओं से मिलकर बनी एक संपूर्ण कला है। यह एक मूकाभिनय है, जिसमें अभिनेता बोलता एवं गाता नहीं है, लेकिन बेहद संवेदनशील माध्यमों जैसे- हाथ के इशारे और चेहरे की भावनाओं के सहारे अपनी भावनाओं की सुगम अभिव्यक्ति देता है। कथकली नाटकीय और नृत्य कला दोनों है। परंतु मुख्य तौर पर यह नाटक है। यह साधारण नाटकीय कला से कहीं ज्यादा अच्छा प्रस्तुतीकरण है। यह यथार्थवादी कला नहीं है, लेकिन अपनी कल्पनाशीलता के चलते यह 'भरत नाट्यशास्त्र' के समानांनतर है। प्रत्येक भावना आदर्शवादी तरीके से गहन जीवंतता के साथ चेहरे के भावों द्वारा व्यक्त की जाती है तथा यह शब्दों के अभाव की भी पूर्ति करती है। चेहरे पर व्यक्त प्रत्येक अभिव्यक्ति नृत्य की लय और संगीत की ताल के साथ छायांकित होती है।[1]
नृत्य में अभिनय केवल मानवीय हृदय की भावनाओं की व्यक्तिपरक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, चित्र, जीव और आसपास की वस्तुओं की संबंधों के अनुसार उद्वेशयपरक अभिव्यक्ति है। इसमें वास्तव में कला के माध्यम से प्रतिरूपण शामिल है और कथकली का सचित्र वैभव और काव्य गौरव गाथा का प्रस्तुतीकरण भी शामिल है। कथकली में संगीत एक महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य तत्व है। इसमें ऑर्केस्ट्रा दो मुखर संगीतकारों द्वारा बनाया जाता है, इनमें से एक 'चेंगला' नामक यंत्र के साथ गीत की तैयारी करता है और दूसरा 'झांझ' और 'मंजीरा' के साथ मिलकर 'इलाथम' नामक जोड़ी की रचना करता है, जिसमें चेन्दा और मदालम भी प्रमुख स्थान रखते हैं। 'चेन्दा' एक बेलनाकार ढोल होता है, जो उंची लेकिन मीठी आवाज निकालता है, जबकि 'मदालम' मृदंग का बडा रूप होता है।

गायन शैली

कथकली संगीत की गायन शैली को एक विशिष्ट सोपान शैली में विकसित किया गया है, जिसकी गति बहुत धीमी होती है। इसमें न ही राग और राग अलापना है और न ही निरावल और सरावल प्रकार से उनका विस्तारण करना है। रागों की व्यापक सुविधाओं के संरक्षण और ताल का सावधानी से पालन करते हुए वे अभिनेता को अभिनय करने की पूरी गुजांइश छोड़ते हुए गाना गाते हैं। कथकली में दो मुख्य संगीतकार होते हैं, जिसमें मुख्य संगीतकार को 'पोनानी' और दूसरे को 'सिनकिडी' के नाम से जाना जाता है। कथकली गायन उच्च काव्य उच्चारण में से है, जिन्हें मलयालम साहित्य के रत्नों में गिना जाता है।[1]
'मुद्रास' अर्थात 'हाथ के इशारे' को शाब्दिक भाषा के विकल्प के तौर पर प्रयोग किया जाता है, लेकिन इससे ज्यादा इसे इस्तेमाल नहीं किया जाता, न ही नाटक में और न ही नृत्य में। चेन्दा के साथ संगत करने के लिए मदालम, चेंगला और इथालम का प्रयोग संगीतकारों के द्वारा किया जाता है, इसके साथ अभिनेता के द्वारा चेहरे के हाव भाव, शारीरिक व्यवहार, अंगुलियों की भाषा और हाथों के इशारों के माध्यम से संगीत का अनुवाद भी किया जाता है। जैसे ही गाने की शुरूआत होती है, अभिनेता अपने मूकाभिनय के साथ और अपने इशारों के माध्यम से ऐसी अभिव्यक्ति करता है, जिससे दर्शक सपनों की दुनिया में अपने आप को महसूस करता है। अभिनेता गाने के शब्दों और ताल के साथ नाटक और नृत्य करता है। मुद्रास कला नृत्य और अभिनय का एक अभिन्न हिस्सा है। कथकली के अधिकांश चरित्र पौराणिक होते हैं, इसलिए उनकी रूप सज्जा यथार्थवादी आधार पर नहीं होती है। इन सभी में रूप सज्जा, पोशाक और शृंगार के पांच विभिन्न प्रकार तय किए हैं, जो उनके वास्तविक चरित्र और गुणों का वर्णन करते हैं।

विशेषताएँ

नृत्य में मानव, देवता समान, दैत्‍य आदि को शानदार वेशभूषा और परिधानों के माध्‍यम से प्रदर्शित किया जाता है। इस नृत्‍य का सबसे अधिक प्रभावशाली भाग यह है कि इसके चरित्र कभी बोलते नहीं हैं, केवल उनके हाथों के हाव भाव की उच्‍च विकसित भाषा तथा चेहरे की अभिव्‍यक्ति होती है, जो इस नाटिका के पाठ्य को दर्शकों के सामने प्रदर्शित करती है। उनके चेहरे के छोटे और बड़े हाव भाव, भंवों की गति, नेत्रों का संचलन, गालों, नाक और ठोड़ी की अभिव्‍यक्ति पर बारीकी से काम किया जाता है तथा एक कथकली अभिनेता नर्तक द्वारा विभिन्‍न भावनाओं को प्रकट किया जाता है। इसमें अधिकांशत: पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते हैं, जबकि अब कुछ समय से महिलाओं को कथकली में शामिल किया जाने लगा है।[1]
वर्तमान समय का कथकली एक नृत्‍य नाटिका की परम्‍परा है, जो केरल के नाट्य कर्म की उच्‍च विशिष्‍ट शैली की परम्‍परा के साथ शताब्दियों पहले विकसित हुआ था, विशेष रूप से कुडियाट्टम। पारम्‍परिक रीति रिवाज जैसे थेयाम, मुडियाट्टम और केरल की मार्शल कलाएँ नृत्‍य को वर्तमान स्‍वरूप में लाने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

भरतनाट्यम नृत्य

भरतनाट्यम नृत्य  

भरतनाट्यम नृत्य
भरतनाट्यम नृत्य शास्त्रीय नृत्य का एक प्रसिद्ध नृत्य है। भरत नाट्यम, भारत के प्रसिद्ध नृत्‍यों में से एक है तथा इसका संबंध दक्षिण भारत केतमिलनाडु राज्‍य से है। यह नाम 'भरत' शब्‍द से लिया गया तथा इसका संबंध नृत्‍यशास्‍त्र से है। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा, हिन्दू देवकुल के महान त्रिदेवों में से प्रथम, नाट्य शास्‍त्र अथवा नृत्‍य विज्ञान हैं। इन्‍द्र व स्‍वर्ग के अन्‍य देवताओं के अनुनय-विनय से ब्रह्मा इतना प्रभावित हुआ कि उसने नृत्‍य वेद सृजित करने के लिए चारों वेदों का उपयोग किया। नाट्य वेद अथवा पंचम वेद, भरत व उसके अनुयाइयों को प्रदान किया गया जिन्‍होंने इस विद्या का परिचय पृथ्‍वी के नश्‍वर मनुष्‍यों को दिया। अत: इसका नाम भरत नाट्यम हुआ। भरत नाट्यम में नृत्‍य के तीन मूलभूत तत्‍वों को कुशलतापूर्वक शामिल किया गया है। ये हैं-
  • भाव अथवा मन:स्थिति,
  • राग अथवा संगीत और स्‍वरमार्धुय और
  • ताल अथवा काल समंजन।
भरत नाट्यम की तकनीक में हाथ, पैर, मुख व शरीर संचालन के समन्‍वयन के 64 सिद्धांत हैं, जिनका निष्‍पादन नृत्‍य पाठ्यक्रम के साथ किया जाता है।
भरतनाट्यम नृत्य

मूल तत्‍व

भरत नाट्यम में जीवन के तीन मूल तत्‍व – दर्शन शास्‍त्र, धर्म व विज्ञान हैं। यह एक गतिशील व सांसारिक नृत्‍य शैली है, तथा इसकी प्राचीनता स्‍वयं सिद्ध है। इसे सौंदर्य व सुरुचि संपन्‍नता का प्रतीक ब‍ताया जाना पूर्णत: संगत है। वस्‍तुत: य‍ह एक ऐसी परंपरा है, जिसमें पूर्ण समर्पण, सांसारिक बंधनों से विरक्ति तथा निष्‍पादनकर्ता का इसमें चरमोत्‍कर्ष पर होना आवश्‍यक है। भरत नाट्यम तुलनात्‍मक रूप से नया नाम है। पहले इसे सादिर, दासी अट्टम और तन्‍जावूरनाट्यम के नामों से जाना जाता था।

मुद्राएं

विगत में इसका अभ्‍यास व प्रदर्शन नृत्‍यांगनाओं के एक वर्ग जिन्‍‍हें 'देवदासी' के रूप में जाना जाता है, द्वारा मंदिरों में किया जाता था। भरत नाट्यम के नृत्‍यकार मुख्‍यत: महिलाएं हैं, वे मूर्तियों के अनुसार अपनी मुद्राएं बनाती हैं, सदैव घुटने मोड़ कर नृत्‍य करती हैं। यह नितांत परिशुद्ध शैली है, जिसमें मनोदशा व अभिव्‍यंजना संप्रेषित करने के लिए हस्‍त संचालन का विशाल रंगपटल प्रयोग किया जाता है। भरत नाट्यम अनुनादी है तथा इसमें नर्तक को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। शरीर ऐसा जान पड़ता है मानो त्रिभुजाकार हो, एक हिस्‍सा धड़ से ऊपर व दूसरा नीचे। यह, शरीर भार के नियंत्रित वितरण, व निचले अंगों की सुदृढ़ स्थिति पर आधारित होता है, ताकि हाथों को एक पंक्ति में आने, शरीर के चारों ओर घुमाने अथवा ऐसी स्थितियाँ बनाने, जिससे मूल स्थिति और अच्‍छी हो, में सहूलियत हो।

शास्त्रीय नृत्य

शास्त्रीय नृत्य  

शास्त्रीय नृत्य प्राचीन हिन्दू ग्रंथों के सिंद्धातों एवं तकनीकों और नृत्य के तकनीकी ग्रंथों तथा कला संबद्वता पर पूर्ण या आंशिक रूप से आधारित है। प्रारंभिक तौर पर यह माना जाता है कि भरत नाट्यशास्त्र को द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास लिखा गया था। शास्त्रीय नृत्य की अधिकतम प्रचलित प्रणालियाँ उच्च स्तर की विस्तृत प्रणालियों से शासित होती थीं और इनका उदय आम आदमी के बीच से ही होता था। शास्त्रीय नृत्य और लोक नृत्य के बीच मुख्य अंतर यह है कि यह पूर्व में जान-बूझकर कलात्मकता द्वारा किया गया प्रयास है। नृत्य और नाटक कला अपने अग्रिम सिंद्वातों और शास्त्रों के नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं। भावना में चित्रित अवधारणा, व्यक्तिगत नृत्य की मोहकता और पृथकता की कला प्रवीणता तीनों ही शास्त्रीय नृत्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

नृत्य नाटिका

भारत में शास्त्रीय नृत्य-नाटिका एक नाट्य स्वरूप है। इसमें अभिनेता जटिल भंगिमापूर्ण भाषा के ज़रिये एक कथा को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करता है और यह स्वरूप अपने सार्वभौमिक प्रभाव में उपमहाद्वीप की भाषाई सीमाओं से ऊपर उठ चुका है। कुछ शास्त्रीय नृत्य-नाटिकाओं, जैसे-कथकलीकुचिपुड़ी और भागवत मेला में लोकप्रिय हिन्दू पौराणिक कथाओं का अभिनय होता है। 20वीं शताब्दी के नर्तक उदयशंकर और शांति वर्द्धन ने इन पारम्परिक नृत्य-नाटिकाओं से प्रेरित बैले का सृजन किया। समकालीन भारतीय निर्देशक और लेखक पारम्परिक नृत्य शैलियों को फिर से परख रहे हैं और अधिक मनोवैज्ञानिक पुनरावेदन तथा गहरे कलात्मक प्रभाव के लिए अपनी रचनाओं में इनका उपयोग कर रहे हैं। भारत के गाँवों में रहने वाले करोड़ों लोग अब भी लोक विरासत की गद्य नाटकों की लोकप्रियता के बावजूद ग्रामीण भारत में नृत्य-नाटिकाओं के माध्यम से अपना मनोरंजन करते हैं। शहरी दर्शकों में सीधे गद्य नाटकों की लोकप्रियता के बावजूद ग्रामीण भारत में नृत्य-नाटिका निश्चित रूप से अधिक गहरा प्रभाव छोड़ती है और ज़्यादा संतुष्टि प्रदान करती है, क्योंकि ग्रामीणों का सौंदर्य बोध अब भी परम्पराओं से जुड़ा हुआ है।

शास्त्रीय नृत्य की तकनीक और प्रकार

नाट्यशास्त्र के अनुसार, नर्तक अभिनेता नाटक के अर्थ को चार प्रकार के अभिनयों के ज़रिये प्रस्तुत करता हैः आंगिक या शरीर के विभिन्न अंगों के शैलीपूर्ण संचालन के माध्यम से भावना की प्रस्तुति; वाचिक या बोली, गीत, स्वर की तारता और स्वरशैली; आहार्य या वेशभूषा और शृंगार; और सात्विक की किसी अन्य पुस्तक में सम्पूर्ण मनोवैज्ञानिक संसाधनों की प्रस्तुति है।

शैलीकृत भंगिमाएँ

कलाकार के पास शैलीकृत भंगिमाओं का जटिल भंडार होता है। शरीर के प्रत्येक अंग, जिनमें से आँखें व हाथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, के लिए पारम्परिक तौर पर मुद्राएँ निर्धारित हैं। सिर के लिए 13, भौंहों के लिए 7, नाक के लिए 6, गालों के लिए 6, ठोड़ी के लिए 7, गर्दन के लिए 9, वक्ष के लिए 5 व आँखों के लिए 36, पैरों व निम्न अंगों के लिए 32, जिनमें से 16 भूमि पर व 16 हवा के लिए निर्धारित हैं। पाँव की विभिन्न गतियाँ, जैसे-इठलाना, ठुमकना, तिरछे चलना, ताल सावधानी से की जाती हैं।

भाव एवं मुद्राएँ

एक हाथ की 24 मुद्राएँ (असंयुक्त हस्त) और दोनों हाथों की 13 मुद्राएँ (संयुक्त हस्त), एक हस्त मुद्रा के एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न 30 अर्थ हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, एक हाथ की पताका मुद्रा, जिसमें सभी अंगुलियों को आगे बढ़ाकर, मुड़े हुए अंगूठे के साथ मिलाकर, गर्मी, वर्षा, भीड़, रात्रि, वन, घोड़ा या पक्षियों की उड़ाने को दिखाया जा सकता है। पताका मुद्रा में ही तीसरी अंगुली मोड़ने का (त्रिपताका) अर्थ मुकुट, वृक्ष विवाह, अग्नि द्वार या राजा भी हो सकता है। कर्कट (केंकड़ा) में दोनों हाथों का उपयोग कर, अंगुलियों को जोड़कर मधुमक्खी का छत्ता, जम्हाई या शंख दिखाया जा सकता है। इन अलग-अलग अर्थों के लिए हाथ की स्थिति या क्रिया भिन्न होगी।
किसी एकल नृत्य नाटिका में अभिनय करते हुए एक पुरुष या एक महिला चेहरे के भाव, मुद्राएँ व मिज़ाज बदलते हुए क्रमशः दो या तीन प्रमुख चरित्रों की अभिनय करती है। उदाहरण के लिए, भगवान कृष्ण, उनकी ईर्ष्यालु पत्नी सत्यभामा व उनकी सौम्य पत्नी रुक्मिणी को एक ही व्यक्ति अभिनीत कर सकता है। हिन्दू नृत्य व रंगमंच का सौंदर्यात्मक आनन्द इस बात पर निर्भर करता है कि कोई कलाकार किसी विशिष्ट भाव को व्यक्त करने व रस जगाने में कितना सफल है।

नृत्य के रस

शाब्दिक रूप में रस का अर्थ 'स्वाद' या 'महक' है और यह आनन्दातिरेक या मनोदशा है, जिसका अनुभव दर्शक किसी नृत्य (अभिनय) प्रदर्शन को देखकर करता है। हिन्दू नाटक के आलोचक कथावस्तु या किसी कविता व नाटक की तकनीकी पूर्णता की ओर अधिक ध्यान देकर रस पर अधिक ध्यान देते हैं।  नृत्य में नौ रस हैं—
इन रसों के संगत भाव भी हैं - प्रेम, हास्य, दुख, क्रोध, ऊर्जा, भय, निराशा, आश्चर्य एवं शान्ति।
इनमें दो प्रकार के भाव हैं। एक तांडव, जो शिव के रौद्र पौरुष, दूसरा लास्य, जो शिव की पत्नी पार्वती के लयात्मक लावण्य का प्रतिनिधित्व करता है, भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से जन्मे भरतनाट्यम में लास्य की प्रधानता है और इसका उदय दक्षिणी भारत के तमिलनाडु राज्य में हुआ है। कथकली केरल में जन्मी तांडव भाव की मूकाभिनय नृत्य-नाटिका है। जिसमें उच्च शिरोवस्त्र व चेहरे का विस्तृत शृंगार किया जाता है। कत्थक लास्य व तांडव का मिश्रण है। क्लिष्ट पदताल व लयात्मक रचनाओं की गणितीय परिशुद्धता इसकी विशेषता है और यह नृत्य उत्तर में फला-फूला, अपनी झूमती व विसर्पित मुद्राओं से युक्त मणिपुरी में लास्य की विशेषताएँ हैं और यह मणिपुर का नृत्य है। 1958 में नई दिल्ली स्थित संगीत नाटक अकादमी ने दो नृत्य शैलियों, आंध्र प्रदेश की कुचिपुड़ी व उड़ीसा की ओडिसी शैली को शास्त्रीय नृत्य का दर्जा दिया। स्वरूप और प्रकृति में, कुचिपुड़ी की कुछ विशेषताएँ भरतनाट्यम से मिलती-जुलती हैं, ओडिसी अपने आप में एक अलग शैली है। इसका नृत्य व्याकरण मूलतः त्रिभंग से विकसित हुआ है। यह उड़ीसा की शैली है।

शास्त्रीय नृत्य की शैलियाँ

भारत में नृत्य की जड़ें प्राचीन परंपराओं में है। इस विशाल उपमहाद्वीप में नृत्यों की विभिन्ऩ विधाओं ने जन्म लिया है। प्रत्ये‍क विधा ने विशिष्ट समय व वातावरण के प्रभाव से आकार लिया है। प्रत्येक विधा किसी विशिष्ट क्षेत्र अथवा व्यक्तियों के समूह के लोकाचार का प्रतिनिधित्व करती है।